क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम्॥ २६॥
क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽयमिति मन्यते।
अनुवाद
यद्यपि संसार में क्षमा की प्रशंसा की जाती है, तथापि पापी मनुष्य कभी क्षमा के योग्य नहीं होता; क्योंकि क्षमा पाकर वह पापी मनुष्य यह सोचता है कि क्षमा करनेवाला मनुष्य मुझसे हारा हुआ है ॥26 1/2॥
Although forgiveness is praised in the world, yet a sinful person is never worthy of forgiveness; because after being forgiven, that sinful person thinks that the forgiving person has lost to me. ॥26 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)