श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  7.198.26-27h 
क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम्॥ २६॥
क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽयमिति मन्यते।
 
 
अनुवाद
यद्यपि संसार में क्षमा की प्रशंसा की जाती है, तथापि पापी मनुष्य कभी क्षमा के योग्य नहीं होता; क्योंकि क्षमा पाकर वह पापी मनुष्य यह सोचता है कि क्षमा करनेवाला मनुष्य मुझसे हारा हुआ है ॥26 1/2॥
 
Although forgiveness is praised in the world, yet a sinful person is never worthy of forgiveness; because after being forgiven, that sinful person thinks that the forgiving person has lost to me. ॥26 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)