श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  7.198.22-23h 
पाञ्चालक सुदुर्वृत्त ममैव गुरुमग्रत:॥ २२॥
गुरोर्गुरुं च भूयोऽपि क्षिपन्नैव हि लज्जसे।
 
 
अनुवाद
हे दुष्ट पांचाल! तू मेरे सामने बार-बार मेरे गुरु और मेरे गुरु के गुरु की निन्दा कर रहा है, फिर भी तुझे लज्जा नहीं आती॥ 22 1/2॥
 
‘You wicked Panchala! You are repeatedly criticising my Guru and my Guru’s Guru in front of me, and yet you are not ashamed.॥ 22 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)