श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  7.198.13-14h 
अकार्यं तादृशं कृत्वा पुनरेव गुरुं क्षिपन्॥ १३॥
वध्यस्त्वं न त्वयार्थोऽस्ति मुहूर्तमपि जीवता।
 
 
अनुवाद
ऐसा पाप कर्म करके तू पुनः गुरु को दोषी ठहरा रहा है; अतः तू वध के योग्य है। तेरा एक क्षण भी जीवित रहना व्यर्थ है॥13 1/2॥
 
‘By committing such a sinful act you are again blaming the Guru; therefore you deserve to be killed. There is no point in you living even for a moment.॥ 13 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)