श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण  »  श्लोक 10-12h
 
 
श्लोक  7.198.10-12h 
एतत् कृत्वा महत् पापं निन्दित: सर्वसाधुभि:॥ १०॥
न लज्जसे कथं वक्तुं समितिं प्राप्य शोभनाम्।
कथं च शतधा जिह्वा न ते मूर्धा च दीर्यते॥ ११॥
गुरुमाक्रोशत: क्षुद्र न चाधर्मेण पात्यसे।
 
 
अनुवाद
इस महापाप के कारण तू समस्त महापुरुषों की दृष्टि में निन्दा का पात्र बन गया है। इस सुन्दर संत-सभा में ऐसी बातें कहते हुए तुझे लज्जा क्यों नहीं आती? तेरी जीभ सैकड़ों टुकड़ों में क्यों नहीं टूट जाती और तेरा सिर क्यों नहीं फट जाता? हे अभागे! गुरु की निन्दा करके तू इस पाप का शिकार क्यों नहीं हो जाता?॥ 10-11 1/2॥
 
‘By committing this great sin you have become an object of condemnation in the eyes of all the great men. How come you are not ashamed of speaking such things in this beautiful gathering of saints? Why doesn't your tongue break into hundreds of pieces and why doesn't your head burst? O wretched one! Why don't you fall by committing this sin of criticising your Guru?॥ 10-11 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)