श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 197: भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  7.197.9-10 
यत् तु धर्मप्रवृत्तस्य हृतं राज्यमधर्मत:।
द्रौपदी च परामृष्टा सभामानीय शत्रुभि:॥ ९॥
वनं प्रव्राजिताश्चास्म वल्कलाजिनवासस:।
अनर्हमाणास्तं भावं त्रयोदश समा: परै:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
परन्तु धर्मपरायण होने पर भी हमारे शत्रुओं ने अधर्मपूर्वक हमारा राज्य छीन लिया, द्रौपदी को सभा में लाकर उसका अपमान किया, हमें मृगचर्म और छाल पहनाकर तेरह वर्ष के लिए वन में निर्वासित कर दिया, हम ऐसे व्यवहार के कदापि योग्य नहीं थे॥9-10॥
 
But despite being devoted to Dharma, our enemies snatched our kingdom by unrighteousness, brought Draupadi in the assembly and insulted her, and made us wear bark and deerskin and exiled us to the forest for thirteen years. We were never worthy of such treatment.॥ 9-10॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd