Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 7.197.8: पिताजी! यह सौभाग्य की बात है कि इस समय भी आपकी बुद्धि अपने धर्म का पालन कर रही है। हे मेरे भाई, जो धर्म से कभी विचलित नहीं होते! यह भी कम सौभाग्य की बात नहीं है कि आपकी बुद्धि क्रूरता की ओर नहीं जाती, अपितु सदैव करुणा में निमग्न रहती है।॥8॥   |   mahabharat अध्याय 7.197: भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 197: भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  7.197.8 
दिष्ट्या तात मनस्तेऽद्य स्वधर्ममनुवर्तते।
आनृशंस्ये च ते दिष्ट्या बुद्धि: सततमच्युत॥ ८॥
 
 
अनुवाद
पिताजी! यह सौभाग्य की बात है कि इस समय भी आपकी बुद्धि अपने धर्म का पालन कर रही है। हे मेरे भाई, जो धर्म से कभी विचलित नहीं होते! यह भी कम सौभाग्य की बात नहीं है कि आपकी बुद्धि क्रूरता की ओर नहीं जाती, अपितु सदैव करुणा में निमग्न रहती है।॥8॥
 
‘Father! It is a matter of good fortune that even at this time your mind follows its Dharma. My brother who never deviates from Dharma! It is no less fortunate that your intellect does not go towards cruelty but is always immersed in compassion.॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)