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mahabharat 7.197.44: अर्जुन! तुम्हारा बड़ा भाई पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर मिथ्यावादी नहीं है, न मैं अधर्मी हूँ। द्रोणाचार्य पापी और शिष्यों के प्रति द्रोही थे, इसीलिए मारे गए। अब तुम युद्ध करो, विजय तुम्हारे हाथ में है॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 7.197: भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 197: भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  7.197.44 
नानृती पाण्डवो ज्येष्ठो नाहं वाधार्मिकोऽर्जुन।
शिष्यद्रोही हत: पापो युध्यस्व विजयस्तव॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन! तुम्हारा बड़ा भाई पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर मिथ्यावादी नहीं है, न मैं अधर्मी हूँ। द्रोणाचार्य पापी और शिष्यों के प्रति द्रोही थे, इसीलिए मारे गए। अब तुम युद्ध करो, विजय तुम्हारे हाथ में है॥ 44॥
 
Arjun! Your elder brother Yudhishthira, the son of Pandava, is not a liar, nor am I unrighteous. Dronacharya was a sinner and a traitor to his disciples, that is why he was killed. Now you fight; victory is in your hands.॥ 44॥
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृष्टद्युम्नवाक्ये सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृष्टद्युम्नवाक्यविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)