|
| |
| |
श्लोक 7.197.18-19  |
स्वयमेवात्मनो दोषान् ब्रुवाण: किन्न लज्जसे।
दारयेयं महीं क्रोधाद् विकिरेयं च पर्वतान्॥ १८॥
आविध्यैतां गदां गुर्वीं भीमां काञ्चनमालिनीम्।
गिरिप्रकाशान् क्षितिजान् भञ्जेयमनिलो यथा॥ १९॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| अपने दोषों का वर्णन करते हुए तुझे लज्जा क्यों नहीं आती? आज मैं क्रोधपूर्वक इस भारी और भयानक सुवर्णमय गदा को घुमाकर इस पृथ्वी को छेद सकता हूँ, पर्वतों को टुकड़े-टुकड़े करके तितर-बितर कर सकता हूँ, तथा पर्वतों पर प्रचण्ड आँधी के समान चमकने वाले ऊँचे वृक्षों को भी तोड़कर उखाड़ सकता हूँ॥ 18-19॥ |
| |
| ‘Why are you not ashamed of describing your own faults? Today, swinging this heavy and fearful mace adorned with gold in anger, I can pierce this earth, shatter the mountains into pieces and scatter them, and can break and uproot even the tall trees shining on the mountains like a strong storm.॥ 18-19॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|