श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 197: भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.197.17 
वासुदेवे स्थिते चापि द्रोणपुत्रं प्रशंससि।
य: कलां षोडशीं पूर्णां धनंजय न तेऽर्हति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
धनंजय! भगवान श्रीकृष्ण के सामने भी तुम द्रोणपुत्र की ऐसी प्रशंसा करते हो, जो तुम्हारे कौशल के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है॥ 17॥
 
Dhananjaya! Even in the presence of Lord Krishna you praise the son of Drona, which is not even equal to one sixteenth of your skill.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)