श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 197: भीमसेनके वीरोचित उद्‍गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.197.15 
वपन् व्रणे क्षारमिव क्षतानां शत्रुकर्शन।
विदीर्यते मे हृदयं त्वया वाक्शल्यपीडितम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
शत्रुसूदन! जैसे कोई घायलों के घाव पर नमक छिड़क देता है (और वे पीड़ा से तड़पने लगते हैं), वैसे ही आप अपने वचनों से मुझे पीड़ा पहुँचाते हैं और मेरे हृदय को छेद देते हैं॥ 15॥
 
Shatrusudan! Just as someone sprinkles salt on the wounds of injured people (and they start writhing in pain), in the same way you torment me by your words and pierce my heart.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)