एक तो वह ब्राह्मण था, दूसरे वह वृद्ध था और तीसरे वह हमारा गुरु था। इसके अतिरिक्त उसने अपने शस्त्र रख दिए थे और वह महामुनि की भाँति बैठा हुआ था। ऐसी दशा में, राज्य के हित के लिए उसे मरवाकर जीवित रहने की अपेक्षा मैं मर जाना ही श्रेयस्कर समझता हूँ ॥53॥
Firstly, he was a Brahmin, secondly, he was old and thirdly, he was our teacher. Besides this, he had put down his weapons and was sitting like a great sage. In this condition, I consider it better to die rather than live by getting him killed for the sake of the kingdom. ॥ 53॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि अर्जुनवाक्ये षण्णवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९६॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५४ श्लोक हैं।)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)