श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 196: कौरव-सेनाका सिंहनाद सुनकर युधिष्ठिरका अर्जुनसे कारण पूछना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाके क्रोध एवं गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  7.196.51 
पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄन् दाराञ्जीवितं चैव वासवि:।
त्यजेत् सर्वं मम प्रेम्णा जानात्येवं हि मे गुरु:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
मेरे गुरुदेव का मानना ​​था कि मेरे प्रति प्रेम के कारण अर्जुन आवश्यकता पड़ने पर अपने पिता, पुत्र, भाई, पत्नी और यहाँ तक कि अपने प्राणों का भी त्याग कर सकता है ॥ 51॥
 
My Gurudev believed that out of love for me, Arjuna could, if required, sacrifice his father, son, brother, wife and even his life. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)