श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 196: कौरव-सेनाका सिंहनाद सुनकर युधिष्ठिरका अर्जुनसे कारण पूछना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाके क्रोध एवं गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  7.196.12-13 
केचिद् भ्रान्तै रथैस्तूर्णं निहतै: पार्ष्णियन्तृभि:।
विपताकध्वजच्छत्रै: पार्थिवा: शीर्णकूबरै:॥ १२॥
भग्ननीडैराकुलाश्वै: प्रारुग्णाश्च विशेषत:।
भग्नाक्षयुगचक्रैश्च व्याकृष्यन्त समन्तत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जिनके पार्श्वरक्षक और सारथि मारे गए थे, जिनकी ध्वजाएँ, पताकाएँ और छत्र नष्ट हो गए थे, जिनके कूबड़ टूटकर बिखर गए थे, जिनके बैठने के स्थान चकनाचूर हो गए थे, जिनकी धुरियों, जूओं और पहियों को भी तोड़ दिया गया था, वे भी विक्षुब्ध घोड़ों द्वारा खींचे जाते हुए वहाँ इधर-उधर भटक रहे थे और कुछ विशेष रूप से घायल राजाओं को भी उनके द्वारा सब ओर खींचा जा रहा था॥12-13॥
 
Those chariots whose side-guards and charioteers had been killed, whose flags, banners and parasols were destroyed, whose humpbacks were broken and scattered, whose seating places were shattered, whose axles, yokes and wheels were also broken, were also drawing about there, drawn by the agitated horses, and some specially wounded kings were being pulled in all directions by them.॥ 12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)