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mahabharat 7.195.9-10h: यदि मेरे जीते जी पिता को केश पकडने का अपमानजनक दुःख सहना पडता है, तो फिर अन्य पुत्रवान पुरुष पुत्र की इच्छा क्यों करेंगे?॥9 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 7.195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  7.195.9-10h 
मयि जीवति यत् तात: केशग्रहमवाप्तवान्॥ ९॥
कथमन्ये करिष्यन्ति पुत्रेभ्य: पुत्रिण: स्पृहाम्।
 
 
अनुवाद
यदि मेरे जीते जी पिता को केश पकडने का अपमानजनक दुःख सहना पडता है, तो फिर अन्य पुत्रवान पुरुष पुत्र की इच्छा क्यों करेंगे?॥9 1/2॥
 
‘If a father has to suffer the humiliating pain of his hair being caught while I am alive, then why would other men who have sons desire to have sons?॥ 9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)