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mahabharat 7.195.41-42h: भरत! मैं जो चाहूँ, वह रूप धारण कर लूँगा और मेरे बाण शत्रुओं पर पड़ेंगे, चाहे वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों।   |   mahabharat अध्याय 7.195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य  »  श्लोक 41-42h
 
 
श्लोक  7.195.41-42h 
यथा यथाहमिच्छेयं तथा भूत्वा शरा मम॥ ४१॥
निपतेयु: सपत्नेषु विक्रमत्स्वपि भारत।
 
 
अनुवाद
भरत! मैं जो चाहूँ, वह रूप धारण कर लूँगा और मेरे बाण शत्रुओं पर पड़ेंगे, चाहे वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों।
 
Bharat! I will assume whatever form I wish and my arrows will fall on the enemies despite their mighty actions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)