श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  7.195.33-34 
अथैनमब्रवीद् राजन् भगवान् देवसत्तम:।
भविता त्वत्समो नान्य: कश्चिद् युधि नर: क्वचित्॥ ३३॥
न त्विदं सहसा ब्रह्मन् प्रयोक्तव्यं कथंचन।
न ह्येतदस्त्रमन्यत्र वधाच्छत्रोर्निवर्तते॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
राजन! तब देवताओं में श्रेष्ठ भगवान नारायण ने उसे वह अस्त्र देकर उससे इस प्रकार कहा - 'ब्रह्मन्! अब युद्ध में तुम्हारी बराबरी करने वाला दूसरा कोई मनुष्य नहीं बचेगा, किन्तु तुम्हें इसका प्रयोग किसी भी प्रकार अचानक नहीं करना चाहिए; क्योंकि यह अस्त्र शत्रु को मारे बिना वापस नहीं आता। 33-34॥
 
King! Then Lord Narayana, the best of the gods, gave him that weapon and said to him thus - 'Brahman! Now there will be no other person left who can match you in battle, but you should not use it suddenly in any way; Because this weapon does not return without killing the enemy. 33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)