Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 7.195.31-32: प्राचीन काल की एक कथा है जब मेरे पिता ने भगवान नारायण को प्रणाम किया और उन्हें विधिपूर्वक वेदों का दान दिया (वैदिक मंत्रों से उनकी स्तुति की)। भगवान स्वयं मेरे समक्ष प्रकट हुए, दान स्वीकार किया और मेरे पिता को वरदान दिया। मेरे पिता ने उनसे वरदान के रूप में सर्वश्रेष्ठ अस्त्र नारायणास्त्र माँगा। | mahabharat अध्याय 7.195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य । mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
नारायणाय मे पित्रा प्रणम्य विधिपूर्वकम्।
उपहार: पुरा दत्तो ब्रह्मरूप उपस्थित:॥ ३१॥
तं स्वयं प्रतिगृह्याथ भगवान् स वरं ददौ।
वव्रे पिता मे परममस्त्रं नारायणं तत:॥ ३२॥
अनुवाद
प्राचीन काल की एक कथा है जब मेरे पिता ने भगवान नारायण को प्रणाम किया और उन्हें विधिपूर्वक वेदों का दान दिया (वैदिक मंत्रों से उनकी स्तुति की)। भगवान स्वयं मेरे समक्ष प्रकट हुए, दान स्वीकार किया और मेरे पिता को वरदान दिया। मेरे पिता ने उनसे वरदान के रूप में सर्वश्रेष्ठ अस्त्र नारायणास्त्र माँगा।
‘It is a story of olden times when my father bowed down to Lord Narayana and offered him the gift of Vedas as per the rituals (praised him with Vedic mantras). The Lord Himself appeared before me, accepted the gift and granted my father a boon. My father requested him for the best weapon of Narayanastra as a boon.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥