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mahabharat 7.195.18-19h: मेरे पर्वत समान पुत्र और शिष्य की मृत्यु के कारण मेरे पिता जीवित रहते हुए भाई विहीन जैसी दयनीय स्थिति में पहुँच गये हैं।   |   mahabharat अध्याय 7.195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  7.195.18-19h 
पित्रा तु मम सावस्था प्राप्ता निर्बन्धुना यथा॥ १८॥
मयि शैलप्रतीकाशे पुत्रे शिष्ये च जीवति।
 
 
अनुवाद
मेरे पर्वत समान पुत्र और शिष्य की मृत्यु के कारण मेरे पिता जीवित रहते हुए भाई विहीन जैसी दयनीय स्थिति में पहुँच गये हैं।
 
My father has reached that miserable condition like being without a brother while still alive, due to the death of my mountain-like son and disciple.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)