श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  7.192.84 
पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा हृष्टा ह्यासन् विशाम्पते।
अरिक्षयं च संग्रामे तेन ते सुखमाप्नुवन्॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
हे प्रजानाथ! विजय प्राप्त करके पाण्डव हर्ष से भर गए। युद्ध में शत्रुओं के भीषण संहार से उन्हें अपार प्रसन्नता हुई। 84.
 
O Prajanath! The Pandavas were filled with joy after achieving victory. They got immense pleasure from the massive destruction of their enemies in the war. 84.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि द्रोणवधे द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें द्रोणवधविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)