उक्तवांश्च महाबाहु: कुन्तीपुत्रो धनंजय:॥ ६५॥
जीवन्तमानयाचार्यं मा वधीर्द्रुपदात्मज।
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सैनिकाश्च ह॥ ६६॥
अनुवाद
यद्यपि उस समय महाबाहु कुन्तीपुत्र अर्जुन ने बहुत कहा- ‘हे द्रुपदपुत्र! गुरु को जीवित कर दो। उन्हें मत मारो।’ आपके सैनिक भी बार-बार यही कहते रहे कि ‘मत मारो, मत मारो।’ 65-66।
Although at that time the mighty-armed son of Kunti, Arjuna, said a lot - 'O son of Drupada! Bring the teacher alive. Do not kill him.' Your soldiers also kept on saying again and again, 'Do not kill, do not kill.' 65-66.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)