श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 65-66
 
 
श्लोक  7.192.65-66 
उक्तवांश्च महाबाहु: कुन्तीपुत्रो धनंजय:॥ ६५॥
जीवन्तमानयाचार्यं मा वधीर्द्रुपदात्मज।
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सैनिकाश्च ह॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि उस समय महाबाहु कुन्तीपुत्र अर्जुन ने बहुत कहा- ‘हे द्रुपदपुत्र! गुरु को जीवित कर दो। उन्हें मत मारो।’ आपके सैनिक भी बार-बार यही कहते रहे कि ‘मत मारो, मत मारो।’ 65-66।
 
Although at that time the mighty-armed son of Kunti, Arjuna, said a lot - 'O son of Drupada! Bring the teacher alive. Do not kill him.' Your soldiers also kept on saying again and again, 'Do not kill, do not kill.' 65-66.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)