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mahabharat 7.192.59-61h: ब्रह्मलोक महान, दिव्य, देवताओं का गुप्त, उत्तम और परम गति है। शत्रुओं का नाश करने वाले आचार्य द्रोण ने योग का आश्रय लेकर महर्षियों के साथ उसी ब्रह्मलोक को प्राप्त किया था। अज्ञानी लोगों ने उन्हें वहाँ जाते हुए नहीं देखा था।   |   mahabharat अध्याय 7.192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 59-61h
 
 
श्लोक  7.192.59-61h 
ब्रह्मलोकं महद् दिव्यं देवगुह्यं हि तत् परम्॥ ५९॥
गतिं परमिकां प्राप्तमजानन्तो नृयोनय:।
नापश्यन् गच्छमानं हि तं सार्धमृषिपुङ्गवै:॥ ६०॥
आचार्यं योगमास्थाय ब्रह्मलोकमरिंदमम्।
 
 
अनुवाद
ब्रह्मलोक महान, दिव्य, देवताओं का गुप्त, उत्तम और परम गति है। शत्रुओं का नाश करने वाले आचार्य द्रोण ने योग का आश्रय लेकर महर्षियों के साथ उसी ब्रह्मलोक को प्राप्त किया था। अज्ञानी लोगों ने उन्हें वहाँ जाते हुए नहीं देखा था।
 
Brahmaloka is great, divine, secret of the gods, excellent and the ultimate destination. Acharya Drona, the destroyer of enemies, attained the same Brahmaloka along with the great sages by taking recourse to yoga. Ignorant people did not see him going there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)