श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  7.192.54 
एकाग्रमिव चासीच्च ज्योतिर्भि: पूरितं नभ:।
समपद्यत चार्काभे भारद्वाजदिवाकरे॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
जब सूर्य के समान तेजस्वी द्रोणाचार्यरूपी दीया (दिव्य प्रकाश) उदय हुआ, तब सम्पूर्ण आकाश तेज से परिपूर्ण हो गया और उस प्रकाश में एकाग्र हो गया प्रतीत होने लगा ॥ 54॥
 
When the diya (divine light) in the form of Dronacharya, who was as radiant as the Sun, rose, the entire sky became filled with brilliance and seemed to be concentrated in that light. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)