श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  7.192.45-46h 
इति तत्र महाराज प्राक्रोशद् द्रौणिमेव च।
उत्सृज्य च रणे शस्त्रं रथोपस्थे निविश्य च॥ ४५॥
अभयं सर्वभूतानां प्रददौ योगमीयिवान्।
 
 
अनुवाद
महाराज! ऐसा कहकर उन्होंने बार-बार अश्वत्थामा का नाम पुकारा। फिर समस्त अस्त्र-शस्त्र युद्धभूमि में फेंककर वे रथ के पिछले भाग में बैठ गए। फिर वे समस्त प्राणियों को अभयदान देकर अन्तर्ध्यान हो गए।
 
Maharaj! Saying this, he called Ashwatthama's name repeatedly. Then throwing all the weapons on the battlefield, he sat in the rear part of the chariot. Then he gave protection to all creatures and went into meditation. 45 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)