श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  7.192.43-44 
कर्ण कर्ण महेष्वास कृप दुर्योधनेति च॥ ४३॥
संग्रामे क्रियतां यत्नो ब्रवीम्येष पुन: पुन:।
पाण्डवेभ्य: शिवं वोऽस्तु शस्त्रमभ्युत्सृजाम्यहम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
कर्ण! कर्ण! हे महाधनुर्धर कृपाचार्य! और दुर्योधन! अब तुम लोग स्वयं ही युद्ध में विजय पाने का प्रयत्न करो, यही मैं तुमसे बार-बार कह रहा हूँ। तुम सब पाण्डवों पर कृपा करें। अब मैं अस्त्र-शस्त्र त्याग रहा हूँ।॥ 43-44॥
 
Karna! Karna! O great archer Kripacharya! And Duryodhan! Now you must try to win the war yourselves, this is what I am telling you again and again. May you all be blessed by the Pandavas. Now I am renouncing arms and weapons.'॥ 43-44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)