श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 41-42h
 
 
श्लोक  7.192.41-42h 
यस्यार्थे शस्त्रमादाय यमपेक्ष्य च जीवसि।
स चाद्य पतित: शेते पृष्ठे नावेदितस्तव॥ ४१॥
धर्मराजस्य तद् वाक्यं नाभिशङ्कितुमर्हसि।
 
 
अनुवाद
‘जिसके लिए तुमने शस्त्र उठाए थे, जिसके जीवन की तुम कामना करते हो और जिसके लिए तुम जी रहे हो, वह आज युद्धभूमि में गिरकर चिर निद्रा में सो रहा है और तुम्हें इसकी सूचना भी नहीं दी गई है। धर्मराज युधिष्ठिर के उस कथन पर तुम्हें संदेह या अविश्वास नहीं करना चाहिए।’॥41 1/2॥
 
‘The person for whom you took up arms, whose life you desire and for whom you are living, has fallen on the battlefield today and is sleeping in eternal sleep and you have not even been informed about it. You should not doubt or disbelieve that statement of Dharmaraja Yudhishthira.'॥ 41 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)