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mahabharat 7.192.38: किसी भी प्राणी को कष्ट न देना ही श्रेष्ठ धर्म माना गया है। इसका मूल ब्राह्मण है और आप उन ब्राह्मणों में भी सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता हैं।' 38.   |   mahabharat अध्याय 7.192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  7.192.38 
अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदु:।
तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तम:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
किसी भी प्राणी को कष्ट न देना ही श्रेष्ठ धर्म माना गया है। इसका मूल ब्राह्मण है और आप उन ब्राह्मणों में भी सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता हैं।' 38.
 
‘Not harming any living creature is considered the best religion. Its root is Brahmin and you are the best knower of Brahman even among those Brahmins. 38.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)