Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 7.192.34: धृष्टद्युम्न अपने बाणों की श्रृंखला से सब दिशाओं को आच्छादित करके उसी प्रकार अपनी किरणों से चमक रहे थे, जैसे अंशुमाली की किरणों से सूर्य चमक रहा हो।   |   mahabharat अध्याय 7.192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  7.192.34 
धृष्टद्युम्नस्तथा राजन् गभस्तिभिरिवांशुमान्।
बभौ प्रच्छादयन्नाशा: शरजालै: समन्तत:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
धृष्टद्युम्न अपने बाणों की श्रृंखला से सब दिशाओं को आच्छादित करके उसी प्रकार अपनी किरणों से चमक रहे थे, जैसे अंशुमाली की किरणों से सूर्य चमक रहा हो।
 
Covering all directions from all sides with his array of arrows, Dhrishtadyumna was shining with rays like the Sun with rays of Anshumali.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)