| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 191: द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिकी शूरवीरता और प्रशंसा » श्लोक 3-4 |
|
| | | | श्लोक 7.191.3-4  | स धनुर्जैत्रमादाय घोरं जलदनि:स्वनम्।
दृढज्यमजरं दिव्यं शरं चाशीविषोपमम्॥ ३॥
संदधे कार्मुके तस्मिंस्ततस्तमनलोपमम्।
द्रोणं जिघांसु: पाञ्चाल्यो महाज्वालमिवानलम्॥ ४॥ | | | | | | अनुवाद | | उस पांचालपुत्र ने द्रोणाचार्य को मारने की इच्छा से हाथ में एक दिव्य धनुष लिया, जिसमें एक मजबूत प्रत्यंचा लगी थी, जो मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि करता था, कभी नष्ट नहीं होता था, भयंकर तथा विजयी था; और उस पर एक बाण चढ़ाया, जो विषैले सर्प के समान भयंकर तथा प्रचण्ड ज्वालाओं वाली अग्नि के समान तेजस्वी था। | | | | That son of Panchala, desiring to kill Dronacharya, took in his hand a divine bow, fitted with a strong bowstring, making a deep sound like the roar of clouds, never getting worn out, fearsome and victorious, and placed on it an arrow, fearsome like a poisonous serpent and as bright as fire with fierce flames. | | ✨ ai-generated | | |
|
|