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श्लोक  7.191.15 
धृष्टद्युम्न: प्रहस्यान्यत् पुनरादाय कार्मुकम्।
शितेन चैनं बाणेन प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे॥ १५॥
 
 
अनुवाद
तब धृष्टद्युम्न ने मुस्कुराते हुए दूसरा धनुष उठाया और एक तीक्ष्ण बाण से आचार्य की छाती पर गहरा घाव कर दिया।
 
Then Dhrishtadyumna, smiling, picked up another bow and with a sharp arrow inflicted a deep wound on the Aacharya's chest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)