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mahabharat 7.190.58: अपने पुत्र के वध की बात सुनकर, जैसा कि महर्षियों ने कहा था, वह अपने को महान पाण्डवों का अपराधी समझने लगा।   |   mahabharat अध्याय 7.190: द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 190: द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  7.190.58 
आगस्कृतमिवात्मानं पाण्डवानां महात्मनाम्।
ऋषिवाक्येन मन्वान: श्रुत्वा च निहतं सुतम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
अपने पुत्र के वध की बात सुनकर, जैसा कि महर्षियों ने कहा था, वह अपने को महान पाण्डवों का अपराधी समझने लगा।
 
On hearing of the killing of his son, as advised by the great sages, he began to regard himself as the culprit of the great Pandavas. 58.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)