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mahabharat 7.190.45: उस समय योद्धाओं में श्रेष्ठ द्रोण इस पृथ्वी को पाण्डवों से रहित करने के लिए उद्यत थे। उनके इस विचार को जानकर भगवान श्रीकृष्ण व्याकुल हो उठे और धर्मराज युधिष्ठिर से बोले -॥45॥   |   mahabharat अध्याय 7.190: द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 190: द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  7.190.45 
ततो निष्पाण्डवामुर्वीं करिष्यन्तं युधां पतिम्।
द्रोणं ज्ञात्वा धर्मराजं गोविन्दो व्यथितोऽब्रवीत्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
उस समय योद्धाओं में श्रेष्ठ द्रोण इस पृथ्वी को पाण्डवों से रहित करने के लिए उद्यत थे। उनके इस विचार को जानकर भगवान श्रीकृष्ण व्याकुल हो उठे और धर्मराज युधिष्ठिर से बोले -॥45॥
 
At that time, Drona, the best among warriors, was ready to make this earth devoid of Pandavas. Knowing this thought of his, Lord Shri Krishna became distressed and said to Dharmaraja Yudhishthir -॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)