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mahabharat 7.190.11-12h: ‘जब वे युद्ध में शस्त्र त्याग देते हैं, तभी मनुष्यों द्वारा उनका वध किया जा सकता है। इसलिए हे पाण्डवों! गुरु को मारना उचित नहीं है, इस धार्मिक भावना को त्यागकर, उन्हें जीतने का प्रयत्न करो, जिससे स्वर्णमय रथधारी द्रोणाचार्य तुम सबको न मार डालें।॥ 11 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 7.190: द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 190: द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  7.190.11-12h 
न्यस्तशस्त्रस्तु संग्रामे शक्यो हन्तुं भवेन्नृभि:।
आस्थीयतां जये योगो धर्ममुत्सृज्य पाण्डवा:॥ ११॥
यथा व: संयुगे सर्वान् न हन्याद् रुक्मवाहन:।
 
 
अनुवाद
‘जब वे युद्ध में शस्त्र त्याग देते हैं, तभी मनुष्यों द्वारा उनका वध किया जा सकता है। इसलिए हे पाण्डवों! गुरु को मारना उचित नहीं है, इस धार्मिक भावना को त्यागकर, उन्हें जीतने का प्रयत्न करो, जिससे स्वर्णमय रथधारी द्रोणाचार्य तुम सबको न मार डालें।॥ 11 1/2॥
 
‘When they lay down their arms in the battle, only then can they be killed by men. Therefore, O Pandavas! Leaving aside the religious sentiment that it is not right to kill one's teacher, make some effort to conquer them, so that Dronacharya, who has a golden chariot, does not kill you all.॥ 11 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)