श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 185: दुर्योधनका उपालम्भ और द्रोणाचार्यका व्यंगपूर्ण उत्तर  »  श्लोक 32-34
 
 
श्लोक  7.185.32-34 
त्वया कथितमत्यर्थं कर्णेन सह हृष्टवत्॥ ३२॥
असकृच्छून्यवन्मोहाद् धृतराष्ट्रस्य शृण्वत:।
अहं च तात कर्णश्च भ्राता दु:शासनश्च मे॥ ३३॥
पाण्डुपुत्रान् हनिष्याम: सहिता: समरे त्रय:।
इति ते कत्थमानस्य श्रुतं संसदि संसदि॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन! तुमने धृतराष्ट्र के सामने, एकान्त-सी सभा में, कर्ण के प्रसन्नचित्त होने पर, बार-बार बड़े जोर से कहा है कि ‘बेटा! मैं, कर्ण और मेरा भाई दु:शासन - ये तीनों मिलकर युद्धभूमि में पाण्डवों का संहार करेंगे।’ मैंने तुम्हें प्रत्येक सभा में ऐसा ही गर्व करते सुना है।
 
Duryodhan! You have repeatedly said with great emphasis in the presence of Dhritarashtra in the assembly that was as though it were a secluded place, with Karna in a very happy mood, that 'Son! I, Karna and my brother Dushasan - these three alone will together kill the Pandavas in the battlefield.' I have heard you boasting like this in every assembly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)