श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 185: दुर्योधनका उपालम्भ और द्रोणाचार्यका व्यंगपूर्ण उत्तर  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  7.185.28-29 
गच्छ त्वमपि कौन्तेयमात्मार्थे जहि मा चिरम्॥ २८॥
त्वमप्याशंसये योद्‍धुं कुलज: क्षत्रियो ह्यसि।
इमान् किं क्षत्रियान् सर्वान् घातयिष्यस्यनागस:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
‘तुम भी जाओ, अपने हित के लिए यथाशीघ्र कुन्तीकुमार अर्जुन का वध करो। तुम भी कुलीन क्षत्रिय हो। मुझे आशा है कि तुममें भी युद्ध करने की शक्ति है, फिर तुम इन सब निरपराध क्षत्रियों का वध व्यर्थ ही क्यों करवाते हो?॥ 28-29॥
 
‘You also go, for your own benefit kill Kuntikumar Arjun as soon as possible. You are also a Kshatriya of noble birth. I hope that you too have the strength to fight, then why would you get all these innocent Kshatriyas killed in vain?॥ 28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)