श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 185: दुर्योधनका उपालम्भ और द्रोणाचार्यका व्यंगपूर्ण उत्तर  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  7.185.27-28h 
त्वं तु सर्वाभिशङ्कित्वान्निष्ठुर: पापनिश्चय:॥ २७॥
श्रेयसस्त्वद्धिते युक्तांस्तत्तद् वक्तुमिहेच्छसि।
 
 
अनुवाद
‘तुम निर्दयी हो और पापमय विचारों वाले हो; इसलिए तुम्हारा मन सदैव सबके प्रति शंकालु रहता है, इसीलिए तुम उन श्रेष्ठ पुरुषों से भी ऐसी बातें कहना चाहते हो जो सदैव तुम्हारा हित करने में तत्पर रहते हैं।॥27 1/2॥
 
‘You are cruel and have sinful thoughts; therefore your mind is always suspicious of everyone, that is why you wish to say such things to even the best men who are always ready to do good to you.॥ 27 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)