श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 185: दुर्योधनका उपालम्भ और द्रोणाचार्यका व्यंगपूर्ण उत्तर  »  श्लोक 22-d1
 
 
श्लोक  7.185.22-d1 
अहं दु:शासन: कर्ण: शकुनिर्मातुलश्च मे॥ २२॥
हनिष्यामोऽर्जुनं संख्ये द्विधा कृत्वाद्य भारतीम्।
(तिष्ठ स त्वं महाबाहो नित्यं शिष्य: प्रियस्तव॥)
 
 
अनुवाद
आज मैं, दु:शासन, कर्ण और मेरे मामा शकुनि कौरव सेना को दो भागों में बाँटकर युद्ध में अर्जुन का वध कर देंगे। हे महाबली! आप चुपचाप खड़े रहिए, क्योंकि अर्जुन सदैव आपका प्रिय शिष्य रहा है।॥22 1/2॥
 
Today I, Dushasan, Karna and my uncle Shakuni will divide the Kaurava army into two parts and kill Arjun in the battle. O mighty one! You stand quietly, because Arjun has always been your favorite disciple.'॥ 22 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)