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mahabharat 7.183.8-9: कर्ण के हाथ में वह शक्ति अंधकारमय रात्रि के समान शत्रुओं का संहार करने के लिए तत्पर थी; परंतु भगवान द्वारा बुद्धि मारे जाने के कारण भगवान की माया से मोहित हुए कर्ण ने इंद्र द्वारा दी गई शक्ति को देवकीनंदन श्रीकृष्ण अथवा इंद्र के समान पराक्रमी अर्जुन पर उनके वध के लिए नहीं छोड़ा॥8-9॥   |   mahabharat अध्याय 7.183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  7.183.8-9 
तस्य हस्तस्थिता शक्ति: कालरात्रिरिवोद्यता।
दैवोपहतबुद्धित्वान्न तां कर्णो विमुक्तवान्॥ ८॥
कृष्णे वा देवकीपुत्रे मोहितो देवमायया।
पार्थे वा शक्रकल्पे वै वधार्थं वासवीं प्रभो॥ ९॥
 
 
अनुवाद
कर्ण के हाथ में वह शक्ति अंधकारमय रात्रि के समान शत्रुओं का संहार करने के लिए तत्पर थी; परंतु भगवान द्वारा बुद्धि मारे जाने के कारण भगवान की माया से मोहित हुए कर्ण ने इंद्र द्वारा दी गई शक्ति को देवकीनंदन श्रीकृष्ण अथवा इंद्र के समान पराक्रमी अर्जुन पर उनके वध के लिए नहीं छोड़ा॥8-9॥
 
That power in Karna's hand was ready to kill the enemy like the night of darkness; But Karna, who was bewitched by the illusion of God due to his intellect being killed by the god, did not release the power given by Indra on Devkinandan Shri Krishna or Arjuna, who was as mighty as Indra, to kill them. 8-9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)