Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 7.183.66-67h: हे पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! तुम्हें सदैव धर्म का ही चिन्तन करना चाहिए तथा मृदुता, तप, दान, क्षमा और सत्य आदि सद्गुणों का बड़े आनन्द से सेवन करना चाहिए; क्योंकि जिस पक्ष में धर्म होता है, वही विजय पाता है।   |   mahabharat अध्याय 7.183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 66-67h
 
 
श्लोक  7.183.66-67h 
नित्यं च पुरुषव्याघ्र धर्ममेवानुचिन्तय।
आनृशंस्यं तपो दानं क्षमां सत्यं च पाण्डव॥ ६६॥
सेवेथा: परमप्रीतो यतो धर्मस्ततो जय:।
 
 
अनुवाद
हे पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! तुम्हें सदैव धर्म का ही चिन्तन करना चाहिए तथा मृदुता, तप, दान, क्षमा और सत्य आदि सद्गुणों का बड़े आनन्द से सेवन करना चाहिए; क्योंकि जिस पक्ष में धर्म होता है, वही विजय पाता है।
 
Purush Singh Pandunandan! You should always think about Dharma and consume the virtues like tenderness, penance, charity, forgiveness and truth etc. with great pleasure; Because the side which has religion wins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)