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mahabharat 7.183.54-55: उस समय पराक्रमी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा - "राजा युधिष्ठिर महारथी कर्ण को मार डालने की इच्छा से क्रोधपूर्वक तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इस समय उन्हें अकेला छोड़ना उचित नहीं है।" ॥54-55॥   |   mahabharat अध्याय 7.183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  7.183.54-55 
ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्वासुदेवो धनंजयम्॥ ५४॥
एष प्रयाति त्वरित: क्रोधाविष्टो युधिष्ठिर:।
जिघांसु: सूतपुत्रस्य तस्योपेक्षा न युज्यते॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
उस समय पराक्रमी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा - "राजा युधिष्ठिर महारथी कर्ण को मार डालने की इच्छा से क्रोधपूर्वक तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इस समय उन्हें अकेला छोड़ना उचित नहीं है।" ॥54-55॥
 
At that time, the powerful Lord Krishna said to Arjuna, "King Yudhishthira is moving forward rapidly with the desire to kill the son of a charioteer, Karna, in a fit of rage. It is not appropriate to leave him alone at this time." ॥ 54-55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)