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mahabharat 7.183.33: जनार्दन! सहदेव के प्रति जो स्वाभाविक प्रेम है, वही तीव्र प्रेम राक्षसराज घटोत्कच के प्रति भी है॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 7.183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  7.183.33 
स्वभावाद् या च मे प्रीति: सहदेवे जनार्दन।
सैव मे परमा प्रीती राक्षसेन्द्रे घटोत्कचे॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जनार्दन! सहदेव के प्रति जो स्वाभाविक प्रेम है, वही तीव्र प्रेम राक्षसराज घटोत्कच के प्रति भी है॥ 33॥
 
Janardan! The same natural love that I have for Sahadev, I have the same intense love for the demon king Ghatotkacha as well.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)