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mahabharat 7.183.14-15: जब भूरिश्रवा और जयद्रथ के वध से कुपित हुए द्रोणाचार्य आए और प्राणों की आसक्ति त्यागकर पाण्डव सेना में प्रवेश करके उसका मंथन करने लगे, तब पाण्डव और संजय योद्धा व्याघ्र के समान जंभाई लेते और खुले मुख वाले यमराज के समान बाणों की वर्षा करते हुए द्रोणाचार्य के सामने कैसे खड़े हो सकते थे?॥ 14-15॥   |   mahabharat अध्याय 7.183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 183: धृतराष्ट्रका पश्चात्ताप, संजयका उत्तर एवं राजा युधिष्ठिरका शोक और भगवान् श्रीकृष्ण तथा महर्षि व्यासद्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  7.183.14-15 
सौमदत्तेर्वधाद् द्रोणमायान्तं सैन्धवस्य च।
अमर्षाज्जीवितं त्यक्त्वा गाहमानं वरूथिनीम्॥ १४॥
जृम्भमाणमिव व्याघ्रं व्यात्ताननमिवान्तकम्।
कथं प्रत्युद्ययुर्द्रोणमस्यन्तं पाण्डुसृञ्जया:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जब भूरिश्रवा और जयद्रथ के वध से कुपित हुए द्रोणाचार्य आए और प्राणों की आसक्ति त्यागकर पाण्डव सेना में प्रवेश करके उसका मंथन करने लगे, तब पाण्डव और संजय योद्धा व्याघ्र के समान जंभाई लेते और खुले मुख वाले यमराज के समान बाणों की वर्षा करते हुए द्रोणाचार्य के सामने कैसे खड़े हो सकते थे?॥ 14-15॥
 
When Dronacharya, enraged by the killing of Bhurishrava and Jayadratha, came and, abandoning the attachment to life, began to enter the Pandava army, churning it, how could the Pandavas and Sanjaya, the warriors, stand before Dronacharya, yawning like a tiger and showering arrows like the open-faced Yamaraja?॥ 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)