श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 182: कर्णने अर्जुनपर शक्ति क्यों नहीं छोड़ी, इसके उत्तरमें संजयका धृतराष्ट्रसे और श्रीकृष्णका सात्यकिसे रहस्ययुक्त कथन  »  श्लोक 35-37h
 
 
श्लोक  7.182.35-37h 
श्रीवासुदेव उवाच
दु:शासनश्च कर्णश्च शकुनिश्च ससैन्धव:।
सततं मन्त्रयन्ति स्म दुर्योधनपुरोगमा:॥ ३५॥
कर्ण कर्ण महेष्वास रणेऽमितपराक्रम।
नान्यस्य शक्तिरेषा ते मोक्तव्या जयतां वर॥ ३६॥
ऋते महारथात् कर्ण कुन्तीपुत्राद् धनंजयात्।
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण बोले - सत्यके ! दु:शासन, कर्ण, शकुनि और जयद्रथ - ये सदैव दुर्योधन को सामने रखकर गुप्त मंत्रणा करते थे और कर्ण को परामर्श देते थे कि 'रणभूमि में असीम पराक्रम दिखाने वाले महाधनुर्धर कर्ण, विजयी वीरों में श्रेष्ठ! इस शक्ति को कुन्तीपुत्र महारथी अर्जुन के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए मत छोड़ो । 35-36 1/2॥
 
Lord Shri Krishna said – Satyake! Dushasan, Karna, Shakuni and Jayadratha - they always kept Duryodhana in front and used to give secret advice and advised Karna that 'Karna, the great archer who displays infinite bravery in the battlefield, the best among the victorious heroes! Do not leave this power to anyone else except the great warrior Arjun, son of Kunti. 35-36 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)