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mahabharat 7.180.28: जैसे वर्षा ऋतु में बादल जल की धारा बरसाता है, वैसे ही कर्ण रूपी बादल दिव्यास्त्रों रूपी जल प्रदान करते हुए बार-बार बाणों की धारा बरसाता रहता है। 28.   |   mahabharat अध्याय 7.180: घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 180: घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  7.180.28 
तपान्ते जलदो यद्वच्छरधारा: क्षरन् मुहु:।
दिव्यास्त्रजलद: कर्ण: पर्जन्य इव वृष्टिमान्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जैसे वर्षा ऋतु में बादल जल की धारा बरसाता है, वैसे ही कर्ण रूपी बादल दिव्यास्त्रों रूपी जल प्रदान करते हुए बार-बार बाणों की धारा बरसाता रहता है। 28.
 
Just as a cloud pours down a torrent of water during the monsoon season, similarly the cloud in the form of Karna, providing water in the form of divine weapons, keeps on showering a stream of arrows again and again. 28.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)