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mahabharat 7.180.20: जैसे मंत्र की शक्ति से क्रोधित सर्प को स्तब्ध किया जा सकता है और प्रज्वलित अग्नि की लपटों को बुझाया जा सकता है, उसी प्रकार आज अपनी शक्ति से रहित कर्ण मुझे वैसा ही दिखाई दे रहा है।   |   mahabharat अध्याय 7.180: घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 180: घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  7.180.20 
आशीविष इव क्रुद्धो जृभितो मन्त्रतेजसा।
तथाद्य भाति कर्णो मे शान्तज्वाल इवानल:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जैसे मंत्र की शक्ति से क्रोधित सर्प को स्तब्ध किया जा सकता है और प्रज्वलित अग्नि की लपटों को बुझाया जा सकता है, उसी प्रकार आज अपनी शक्ति से रहित कर्ण मुझे वैसा ही दिखाई दे रहा है।
 
Just as an enraged serpent can be stunned by the power of a mantra and the flames of a blazing fire can be extinguished, Karna deprived of his strength appears to me like that today.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)