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श्लोक 7.179.55  |
तामुत्तमां परकायावहन्त्रीं
दॄष्ट्वा शक्तिं बाहुसंस्थां ज्वलन्तीम्।
भीतं रक्षो विप्रदुद्राव राजन्
कृत्वाऽऽत्मानं विन्ध्यतुल्यप्रमाणम्॥ ५५॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! कर्ण के हाथों में दूसरे के शरीर को छिन्न-भिन्न कर देने वाली वह उत्तम एवं प्रज्वलित शक्ति देखकर राक्षस घटोत्कच भयभीत हो गया और उसने अपना शरीर विन्ध्य पर्वत के समान विशाल बना लिया और भाग गया॥55॥ |
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| Rajan! Seeing that excellent and burning power in the hands of Karna, which could disintegrate another's body, the demon Ghatotkacha got scared and made his body as big as Vindhya mountain and ran away. 55॥ |
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