श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 179: घटोत्कचका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा चलायी हुई इन्द्रप्रदत्त शक्तिसे उसका वध  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  7.179.47 
ततो हताश्वादवरुह्य याना-
दन्तर्मना: कुरुषु प्राद्रवत्सु।
दिव्ये चास्त्रे मायया वध्यमाने
नैवामुह्यच्चिन्तयन् प्राप्तकालम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
तब कर्ण उस अश्वरहित रथ से उतरकर एकाग्रचित्त होकर कुछ सोचने लगा। उस समय सभी कौरव सैनिक भाग रहे थे। घटोत्कच की माया से उसके दिव्यास्त्र भी नष्ट हो रहे थे, फिर भी वह मोह में न पड़ा और समयानुकूल कर्तव्य का चिंतन करता रहा। 47
 
Then Karna got down from that horseless chariot and started thinking about something by concentrating his mind. At that time all the Kaurava soldiers were running away. Even his divine weapons were getting destroyed by Ghatotkacha's illusion, but still he did not fall prey to the temptation and kept thinking about the timely duty. 47.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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