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mahabharat 7.175.92: हे मनुष्यों के स्वामी! जैसे मशालों से जलते हुए तेल की बूँदें गिरती हैं, उसी प्रकार क्रोधित घटोत्कच के दोनों नेत्रों से अग्नि की चिंगारियाँ निकलने लगीं॥92॥   |   mahabharat अध्याय 7.175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  7.175.92 
तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां पावक: समजायत।
महोल्काभ्यां यथा राजन् सार्चिष: स्नेहबिन्दव:॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जैसे मशालों से जलते हुए तेल की बूँदें गिरती हैं, उसी प्रकार क्रोधित घटोत्कच के दोनों नेत्रों से अग्नि की चिंगारियाँ निकलने लगीं॥92॥
 
O Lord of men! Just as drops of burning oil fall from torches, in the same manner sparks of fire began to come out from both the eyes of the enraged Ghatotkacha.॥92॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)