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mahabharat 7.175.73-74: घटोत्कच को रक्त के सागर के समान काला पर्वत बनते तथा अपनी धाराओं से भयंकर अस्त्र-शस्त्र छोड़ते देखकर भी कर्ण को तनिक भी क्रोध नहीं आया। उसने मुस्कुराते हुए अपने दिव्य अस्त्र प्रकट कर दिए।   |   mahabharat अध्याय 7.175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम  »  श्लोक 73-74
 
 
श्लोक  7.175.73-74 
तमञ्जनचयप्रख्यं कर्णो दृष्ट्वा महीधरम्॥ ७३॥
प्रपातैरायुधान्युग्राण्युद्वहन्तं न चुक्षुभे।
स्मयन्निव तत: कर्णो दिव्यमस्त्रमुदैरयत्॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
घटोत्कच को रक्त के सागर के समान काला पर्वत बनते तथा अपनी धाराओं से भयंकर अस्त्र-शस्त्र छोड़ते देखकर भी कर्ण को तनिक भी क्रोध नहीं आया। उसने मुस्कुराते हुए अपने दिव्य अस्त्र प्रकट कर दिए।
 
Karna did not feel the slightest anger even after seeing Ghatotkacha becoming a black mountain like the ocean of blood and releasing dreadful weapons through his streams. He revealed his divine weapon while smiling.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)