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mahabharat 7.175.55-56h: युद्धभूमि में घटोत्कच, उसके घोड़े, रथ और यहाँ तक कि उसका ध्वज भी कोई नहीं देख सकता था, जो बाणों की बौछार से घिरा हुआ था।   |   mahabharat अध्याय 7.175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम  »  श्लोक 55-56h
 
 
श्लोक  7.175.55-56h 
न हयान्न रथं तस्य न ध्वजं न घटोत्कचम्॥ ५५॥
दृष्टवन्त: स्म समरे शरौघैरभिसंवृतम्।
 
 
अनुवाद
युद्धभूमि में घटोत्कच, उसके घोड़े, रथ और यहाँ तक कि उसका ध्वज भी कोई नहीं देख सकता था, जो बाणों की बौछार से घिरा हुआ था।
 
In the battle-field, no one could see Ghatotkacha, his horses, chariot and even his flag who was surrounded by a barrage of arrows. 55 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)