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mahabharat 7.175.17-18h: घटोत्कच अपने सारथि के साथ बैठे हुए ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो विशाल पर्वत और विशाल मेघ संयुक्त हों। उनके रथ पर आकाश को छूती हुई एक बहुत ऊँची ध्वजा लहरा रही थी, जिस पर एक लाल सिर वाला अत्यंत क्रूर मांसाहारी गिद्ध दिखाई दे रहा था।   |   mahabharat अध्याय 7.175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  7.175.17-18h 
संसक्त इव चाभ्रेण यथाद्रिर्महता महान्।
दिव:स्पृक् सुमहान् केतु: स्यन्दनेऽस्य समुच्छ्रित:॥ १७॥
रक्तोत्तमाङ्ग: क्रव्यादो गृध्र: परमभीषण:।
 
 
अनुवाद
घटोत्कच अपने सारथि के साथ बैठे हुए ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो विशाल पर्वत और विशाल मेघ संयुक्त हों। उनके रथ पर आकाश को छूती हुई एक बहुत ऊँची ध्वजा लहरा रही थी, जिस पर एक लाल सिर वाला अत्यंत क्रूर मांसाहारी गिद्ध दिखाई दे रहा था।
 
Ghatotkacha looked as graceful as a great mountain combined with a great cloud while sitting with his charioteer. A very tall flag touching the sky was fluttering on his chariot, on which a red-headed, extremely ferocious carnivorous vulture could be seen. 17 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)